Tuesday, May 16, 2017

सुबह से देख रहा हूँ
ये पहाड़ वहीँ का वहीँ खड़ा है,
ठीक मेरे सामने,
न वो हट रहा है, न मैं उठ रहा हूँ .....
..पर, इस वक़्त जहाँ तुम हो,
और इसे पढ़ रहे हो,
तुम्हे नहीं समझ आएगा, यहाँ क्या हो रहा है,
और ...अगर तुम यहाँ होते भी,
तो क्या उखाड़ लेते?
ये पहाड़ यहीं का यहीं खड़ा होता ठीक मेरे सामने,
न मैं हटता, न वो उठता,
और तुम निकल जाते,
किसी cafe में जाकर,
किसी पहाड़ी chicken की बोटियाँ चाटने...


-प्रणव मिश्र

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