Tuesday, April 25, 2017

कैसे कोई देखे,
मेरे अन्दर बसी तुम्हारी परछाइयों को,
बस तुम नाम हो उनके लिए,
जो मैं लेता नहीं,
तुम्हारे होठों की वो खुश्क दरारें,
आज भी याद हैं मुझे,
सर्दियों की रात थी,
और सूख गए थे शायद,
कैसे कोई रोके,
मुझे अब,..  तुमसे दूर होके,
ख़याल मिल आते हैं,
अकेले में तुमसे,
कैसे कोई फूके,
जान,.. अब,
जब कितना कुछ कहता हूँ दिन रात,
पर कोई समझता नहीं,
कैसे?... कोई तो होगा,
तरीका कि एक बार,
फिर से हो सामने तुम,...,
और मैं गीला करूँ तुम्हरे सूखे होठों को,
अपनी बात कहते हुए। 



-प्रणव मिश्र 




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