Sunday, January 8, 2017

यूहीं उतर आया पानी।

एक गाना कानों में पड़ा
सालों बाद,
और
यूहीं उतर आया पानी,
मैं छुप छुप कर,
चेहरे पर रखने के बहाने,
उठाता हाथ, और
उँगलियों के नाखूनों से पोंछता रहा,
रात भर आँसू ,
न जाने कौन सी नब्ज़ दब गयी थी,
यूहीं बैठे -बैठे,
कि साँसे आती तो थीं,
पर निकलते वक़्त,
गला choke होता,
और ख़ूब ज़ोर से ज़ोर लगाकर,
अन्दर हि अन्दर निगलता रहा, मैं,
रात भर आँसू,
जी बहुत करा कि एक बार रोलो Pranav,
जी भर के,
ये किस्सा ही ख़त्म करदो,
पर न जाने क्या मज़ा मिलता है तुम्हें,
अपनी बीती ज़िन्दगी को over romanticize करने में,
तपने में, याद करने में उन बातों को,
जो लोग अक्सर भूल जाते हैं,
और तुम इकट्ठा करते रहते हो,
फिर guess करते हो, अरे! देखो,
युहीं उतर आया पानी,

जी बहुत करा,
कि कुछ साल पीछे जाऊं,
और फिर से अपने उसी दोस्त के i-pod पे बार-बार बजाऊं यही गाना,
वो पीछे बैठे bike पे,
फिर से लगाऊं earphones का left हिस्सा अपने कान में,
और दूं Right उसको,
जब मेरा earphone फिसले कानो के बाहर,
तो मैं गुनगुनाऊँ,
कि कहीं flow न brake हो जाये,
और वो पास आये और fix कर दे,
फिर सिर्फ इसको repeat पे लगा कर कहे,
"इसी को सुनते हैं आज,
 न मैं कुछ बोलूं, न तुम कुछ कहो,
तुम गाड़ी चलाओ,
और मैं कुछ देर को आँख बंद कर रही हूँ,
कंधे पर तुम्हारे,
क्योंकि मज़ा आ रहा है, और डर भी है,
कि  कहीं flow न brake  हो जाये। "

देखो मैं आज भी सुनता हूँ,
जब भी बजता है ये गाना,
repeat पे,
और दाहिने कान पे हाथ रख लेता हूँ,
कि वो हिस्सा तुम्हारा है,
फिर तक़लीफ़ भी नहीं होती,
क्योंकि आसानी से पोंछता रहता हूं उँगलियों के नाखूनों से,
मैं रात भर आँसू।


- प्रणव मिश्र

















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