Saturday, January 28, 2017

let's go back to 1984.

छोटे छोटे सपने,
देखते देखते, 
वो कितना बड़ा हो गया,
जैसे पुरानी हिन्दी फिल्मों में,
भागते भागते 
बड़े होते थे किरदार,
फिर flashback में,
थोड़ा बचपन दिखता ,और थोड़ा सफ़र,
और थोड़ा Director जो दिखा देता,
फिर film खत्म होते होते,
जब villain का क़त्ल होता,
तो सब कहते भई Hero क़माल था, 
पर असल ज़िन्दगी में, उसके साथ 
दिक्कत flashback में जाने की थी,
सबको बस अपना जवान Hero दिखता,
न कराया किसी ने उसके बचपन से तारुफ़,
और न दिखाया किसी ने उसका सफ़र,
और वो भी कुछ Shy किस्म का character निकला,
वो जो feelings छुपा के चलते हैँ, कि कहीं चोरी न हो जाये,
तो movie के second half  में  object करने वाले सब खड़े हो गए,
कि आख़िर तुमने क़त्ल क्यों किया ?




-प्रणव मिश्र 

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