Friday, May 10, 2013

डामर की यह रोड।

वोह रास्ता  जो मेरे गाँव को जाता था,
वहां किसी ने डामर की इक रोड बना दी है।

कुछ  बत्तियां भी हैं नयी, कुछ तारे भी कम हुए हैं,
इधर नीम के पेड़ कम, और गाड़ियाँ के इंजन ज्यादा नम हुए हैं,
मुस्कान भी अब मुस्कुराती कम है,
बस देखती रहती है कहीं,
और फिर चल देती है वहीँ ,
जहां किसी ने डामर की इक रोड बना दी है।

कभी हवाएं भी चलती थीं यहाँ,
कभी शाख से टूटे पत्ते इधर भी रुख़ करते थे,
छुटकन तब साइकिल के पहिये से खेलता था,वहीं,
जहां किसी ने डामर की इक रोड बना दी है।

कई साल हो गए थे मुझे, मेरे गाँव से मिले हुए,
मुझे याद है आज भी हम हर साल इकठ्ठा होते थे नदी के उस तट पर,
सरपंच का बेटा राम बनता था,और पुजारी का रावण,
सीता धोबियों के टोले से आती थी शायद,
पानी सूख गया है अब,
सीता के अब दो बच्चे भी हैं,
उन बच्चों को उस सूखी नदी में खेलते देख मुझे वोह रास्ता याद आ गया,
जहां किसी ने डामर की इक रोड बना दी है।




डामर की यह रोड।

 

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